शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

कविता सा कुछ

एक रिश्ता,
एक तलाश,
एक सच,
एक आकाश..

इतना कुछ देकर,
मेरे मन को छूकर,
हँसते हुए रोकर,
छुप गए यूँ ही,
दूर हो गए
बिना कुछ कहे ही... 

कविता सा कुछ

याद है..
इक खत लिखा था तूने
सुफेद कागज पे,
लाल स्याही से..

खत..
जिसके इक अक्षर पे
आंसू की इक बूँद गिरी थी..

वहीँ उस अक्षर पे मैं डूबा था..
रातें जाने  कितनी लगी
साहिल तक आने को
रातें जितनी तूने  काटी थी
इक खत लिखने को..

रविवार, 23 जनवरी 2011

college days...





















enjoying some sunshine....avi the gentleman...for abhi no comments..
abdur and me...you don't a get chance to get clicked with a genius everyday!!!

my room...my room...my room...


sarjana 2k4 ...the gang...
a party where everybody got gifts..6th apr.2006.

3 batches...simply the best days in sarjana...

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

प्रेम गीत

कल रात तुम थी मेरी आँखों में
और जितने तारे थे
मैंने सब गिन डाले
एक अंगूठी थी जो खरीदनी थी.

सांसों के धागे से
एक आँचल बुनता रहा मैं
जिसे माथे पर डाले तुम खिलखिलाती

और मैं मुस्कुराता.

गीत जो बस्ती में
गाती है कोई दोशीजा
तो वो प्रेमगीत है ,
मैंने रात भर वो संगीत पीया है.

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

सबकुछ कितना सिंपल है

सोचता हूँ अब कुछ कर लूँगा
तुम गुनगुनाओगी
तो रिकार्ड कर लूँगा.
तुम हंसोगी
तो चुन लूँगा.
विंडचाइम की तरह
खिड़की पे टांग लूँगा.
जब भी खिड़की खुलेगी
कमरे में तुम्हारी हंसी बजेगी.
बस तुम्हारी हंसी रहेगी.
उसी से सबा उसी से शब होगी.
और ये सोच कर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे डिम्पल है.

कुछ ऐसा करेंगे
जब हम फिर कभी मिलेंगे
तुम ले आना
अपने हैण्डबैग में
अपनी थोड़ी सी दुनिया
वो थोड़ी थोड़ी दुनिया हम घर में लगा लेंगे
रंग लेंगे दीवारों पे
मेजों पे सजा लेंगे
रखे हैं गुलदान जहाँ
उन कोनों में बिछा देंगे.
वहीँ खिडकियों से आती
धुप का मलमल है.
और ये सोचकर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे  डिम्पल है.

जब रातें गुजरेंगी
कुछ सपनों में लिपटी लिपटी
और सवेरे तुम जागोगी
महकी-महकी, सिमटी-सिमटी,
एक अदने शीशे की क्या औकात'
जो तेरे उस रूप को दिखलाये
इससे पहले की वोह
शर्म से खुद टूट कर गिर जाये
दीवार पे टांगने को एक नदी खरीद लेंगे
बजट में नहीं है पर एडजस्ट कर लेंगे
और ये सोचकर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे  डिम्पल है

रविवार, 11 अक्टूबर 2009

दिवाली

कई लोग इस दिवाली पर घर नहीं जा सकेंगे पर घर की याद तो आती ही है न ये कविता उन्ही लोगों के लिए है

घर
दिवाली आने वाली है
तो जी किया
कमरे साफ़ कर लूँ, सजा दूँ
जैसे माँ किया करती है
हर दिवाली पर...

करीने से सजाती है गुलदान,
परदे, चादरें, तकियों के खोल बदलती है
रसोई के अनछुए बर्तन साफ़ करती है
और अलमारी में पड़े साफ़ कपड़े फ़िर से तह लगाती है माँ

पुराने अख़बार, पुरानी मैगजीन ,
कब से, न जाने कहाँ से जमा हो गए
कबाड़ को माँ
कबाडी वाले को औने-पौने दाम में बेच देती है

पूरे घर को, हर कोने को
ख़ुद बार-बार साफ़ करती है
उड़द की बडियां, पुराने अचार ,
रजाई और तोशक को धुप दिखाती है
ये जो छोटे का स्वेटर चूहे ने कुतरा था
वापस उसी तरह संभाल कर रखती है माँ

इतना कुछ करके भी माँ रूकती नहीं
पसीने से तर-ब-तर माँ कुछ सोचती है
जब कुछ याद नहीं आता
माँ वहीँ थक कर बैठ जाती है
ख़ुद को अंचल से हवा करते हुए
और कमर , घुटने का दर्द वापस लौट आता है

हर साल ये दर्द बढ़ता जाता है
पर माँ फ़िर भी दिवाली की ये सफाई करती है
शायद ये कुछ ही उस घर को 'घर ' बनता है

घर जिसके नाम से ही एक सौंधी सी खुशबु आंखों में चढ़ आती है
और शायद इसलिए
ये दो कमरे का फ्लैट , घर नहीं लगता

पर दिवाली आने वाली है
तो जी किया
कमरे साफ़ कर लूँ, सजा दूँ
जैसे माँ किया करती है
हर दिवाली पर...

सोमवार, 15 दिसंबर 2008

कोलकाता दुर्गापुर भिलाई

कई दिनों से नियति के हांथों का खिलौना बना हुआ हूँ। आईबीएम को छोड कर वापस अपने पसंद के क्षेत्र में काम कर रहा हूँ। शायद यही सही था मेरे लिए। अभी कुछ दिनों...लगभग दो महीने से दुर्गापुर में हूँ। और २० दिसम्बर से एक हफ्ते कोरबा और फ़िर भिलाई। तो वापस शायद अगले साल से नियमित हो सकूँगा। मिलता हूँ फ़िर से।