
कोलकाता आए अभी कुछ ही दिन हुए हैं। २४ जुलाई को यहाँ आया और उसी दिन से नौकरी बजाने में लगा हूँ। कॉलेज छोड़े अभी जियादा दिन नहीं बीते सो वहां की आदतें भी नहीं बदली। कॉलेज में शाम होते ही हम अपने दोस्तों के साथ निकल पड़ते थे। अविनाश, अभिषेक, अजय, अब्दुर, कपिलजी हमारे ब्रांच के थे सो हम साथ ही निकलते। पहले तो बापूनगर के बंकुरा स्वीट्स में समोसे और जिलेबियां। फ़िर लौटते हुए हमें जिस रस्ते से आना होता था वहां से सूरज को ढलते देखना बड़ा ही अच्छा लगता था। बातचीत का सिलसिला हमेशा किसी बोरिंग प्रोफ़ेसर से शुरू होकर लड़कियों तक पहुँच ही जाता था। फ़िर किसे पड़ी थी की क्लास में आज heat-transfer और Applied thermo में क्या हुआ । बस रात तक किसी तरह पिछले sessional के डाटा मिल जाने चाहिए। वैसे इस मामले में हम सभी आपसी understanding से काम लेते थे। अगर आज किसी ने डाटा नही दिया तो तय है की कल उसे भी डाटा नहीं मिलाने का। हर एक का दिन आता है। हाँ, तो बात हो रही थी शाम की। बंकुरा से लौटते हुए १२ नम्बर गेट पर बैठने की भी जरूरत हुआ करती थी। ये किसी गाँव की चौपाल हो, सारे BIT की खबरें मिल जाया करती थी। अच्छा लगता था । उसके बाद किसी तरह ७-८ बजे तक अपने कमरे तक पहुँच सका तो ठीक नहीं तो वो शाम चाँद के नाम । अगर शाम के आसमान पर चाँद हुआ तो । वैसे हमारे हॉस्टल के सामने ही खुली सी जगह थी । चाँद को देखते -देखते और बतियाते हुए ,सीधे शब्दों sentiyaate हुए हम अपने कॉलेज के बी जोन से ऐ -जोन की तरफ़ चल पड़ते थे। रस्ते में BIT मन्दिर में भी शीश झुका लेते थे । फ़िर जब पेट में चूहे कूदने लगते थे तो हम उलटे पाँव अपने हॉस्टल लौट पड़ते थे। पूरी शाम उसी तरह गुजर जाया करती। हर दिन का यही सिलसिला हुआ करता। फ़िर रात कोई पुरानी फ़िल्म या कोई नयी नोवेल। याद नही आता की कभी हॉस्टल में १२ से पहले सोया हूँ। रात भी कभी -कभी अविनाश के कमरे में महफ़िल जमी रहती। सब वही जमे रहते जब तक अविनाश नींद के मारे परेशां नही हो जाता। हम भी उसे परेशां करने को वहीं जमे रहते।
पर यहाँ कोलकाता में बस उस मस्ती की यादें ही रह गयी हैं। अब तो बस सुबह उठ कर ऑफिस जाने की जल्दी रहती है। ऑटो -रिक्शा की लाइन में सुबह से शाम हो रही है। ऑफिस के परदे लगे खिड़कियों से तो पता ही नही चलता की वक्त क्या हुआ है? कभी कभी दोस्तों से बात हो जाया करती है और बीते दिन और ज्यादा शिद्दत से याद आने लगते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूँ की इतनी पढ़ाई क्या ये दिन-रात का चैन खोने के लिए ही की है??
पर क्या करें जिंदगी इसी चिडिया का नाम है , पिंजरे में कैद चिडिया।
अब विदा।
पर यहाँ कोलकाता में बस उस मस्ती की यादें ही रह गयी हैं। अब तो बस सुबह उठ कर ऑफिस जाने की जल्दी रहती है। ऑटो -रिक्शा की लाइन में सुबह से शाम हो रही है। ऑफिस के परदे लगे खिड़कियों से तो पता ही नही चलता की वक्त क्या हुआ है? कभी कभी दोस्तों से बात हो जाया करती है और बीते दिन और ज्यादा शिद्दत से याद आने लगते हैं। कभी-कभी तो सोचता हूँ की इतनी पढ़ाई क्या ये दिन-रात का चैन खोने के लिए ही की है??
पर क्या करें जिंदगी इसी चिडिया का नाम है , पिंजरे में कैद चिडिया।
अब विदा।