कल रात तुम थी मेरी आँखों में
और जितने तारे थे
मैंने सब गिन डाले
एक अंगूठी थी जो खरीदनी थी.
सांसों के धागे से
एक आँचल बुनता रहा मैं
जिसे माथे पर डाले तुम खिलखिलाती
और मैं मुस्कुराता.
गीत जो बस्ती में
गाती है कोई दोशीजा
तो वो प्रेमगीत है ,
मैंने रात भर वो संगीत पीया है.
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