सोचता हूँ अब कुछ कर लूँगा
तुम गुनगुनाओगी
तो रिकार्ड कर लूँगा.
तुम हंसोगी
तो चुन लूँगा.
विंडचाइम की तरह
खिड़की पे टांग लूँगा.
जब भी खिड़की खुलेगी
कमरे में तुम्हारी हंसी बजेगी.
बस तुम्हारी हंसी रहेगी.
उसी से सबा उसी से शब होगी.
और ये सोच कर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे डिम्पल है.
कुछ ऐसा करेंगे
जब हम फिर कभी मिलेंगे
तुम ले आना
अपने हैण्डबैग में
अपनी थोड़ी सी दुनिया
वो थोड़ी थोड़ी दुनिया हम घर में लगा लेंगे
रंग लेंगे दीवारों पे
मेजों पे सजा लेंगे
रखे हैं गुलदान जहाँ
उन कोनों में बिछा देंगे.
वहीँ खिडकियों से आती
धुप का मलमल है.
और ये सोचकर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे डिम्पल है.
जब रातें गुजरेंगी
कुछ सपनों में लिपटी लिपटी
और सवेरे तुम जागोगी
महकी-महकी, सिमटी-सिमटी,
एक अदने शीशे की क्या औकात'
जो तेरे उस रूप को दिखलाये
इससे पहले की वोह
शर्म से खुद टूट कर गिर जाये
दीवार पे टांगने को एक नदी खरीद लेंगे
बजट में नहीं है पर एडजस्ट कर लेंगे
और ये सोचकर लगता है
सबकुछ कितना सिंपल है
जैसे तुम्हारे गालों पे डिम्पल है
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