काश आती घटा से छनकर
चांदनी यूँ कुछ
जैसे मुस्कुराहटें तेरी
जुल्फों से छनकर आती हैं.
बीतते लम्हे, सांस-दर-सांस
सुनाती तुम कुछ
और
सुनती कुछ
हर सांस के साथ
मेरे मन की.
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सोमवार, 15 दिसंबर 2008
कोलकाता दुर्गापुर भिलाई
कई दिनों से नियति के हांथों का खिलौना बना हुआ हूँ। आईबीएम को छोड कर वापस अपने पसंद के क्षेत्र में काम कर रहा हूँ। शायद यही सही था मेरे लिए। अभी कुछ दिनों...लगभग दो महीने से दुर्गापुर में हूँ। और २० दिसम्बर से एक हफ्ते कोरबा और फ़िर भिलाई। तो वापस शायद अगले साल से नियमित हो सकूँगा। मिलता हूँ फ़िर से।
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