रविवार, 11 अक्टूबर 2009

दिवाली

कई लोग इस दिवाली पर घर नहीं जा सकेंगे पर घर की याद तो आती ही है न ये कविता उन्ही लोगों के लिए है

घर
दिवाली आने वाली है
तो जी किया
कमरे साफ़ कर लूँ, सजा दूँ
जैसे माँ किया करती है
हर दिवाली पर...

करीने से सजाती है गुलदान,
परदे, चादरें, तकियों के खोल बदलती है
रसोई के अनछुए बर्तन साफ़ करती है
और अलमारी में पड़े साफ़ कपड़े फ़िर से तह लगाती है माँ

पुराने अख़बार, पुरानी मैगजीन ,
कब से, न जाने कहाँ से जमा हो गए
कबाड़ को माँ
कबाडी वाले को औने-पौने दाम में बेच देती है

पूरे घर को, हर कोने को
ख़ुद बार-बार साफ़ करती है
उड़द की बडियां, पुराने अचार ,
रजाई और तोशक को धुप दिखाती है
ये जो छोटे का स्वेटर चूहे ने कुतरा था
वापस उसी तरह संभाल कर रखती है माँ

इतना कुछ करके भी माँ रूकती नहीं
पसीने से तर-ब-तर माँ कुछ सोचती है
जब कुछ याद नहीं आता
माँ वहीँ थक कर बैठ जाती है
ख़ुद को अंचल से हवा करते हुए
और कमर , घुटने का दर्द वापस लौट आता है

हर साल ये दर्द बढ़ता जाता है
पर माँ फ़िर भी दिवाली की ये सफाई करती है
शायद ये कुछ ही उस घर को 'घर ' बनता है

घर जिसके नाम से ही एक सौंधी सी खुशबु आंखों में चढ़ आती है
और शायद इसलिए
ये दो कमरे का फ्लैट , घर नहीं लगता

पर दिवाली आने वाली है
तो जी किया
कमरे साफ़ कर लूँ, सजा दूँ
जैसे माँ किया करती है
हर दिवाली पर...

2 टिप्‍पणियां:

वीरेन्द्र वत्स ने कहा…

अच्छी रचना. बधाई. आपमें काफी संभावनाएं हैं. लिखना जारी रखें.

Vinashaay sharma ने कहा…

स्वागत है, बलोगजगत में, दिवाली पर लिखी अच्छी रचना ।