सबसे पहले अंतरजाल पर सभी चिठाकारों को मेरा प्रणाम ।
ये ब्लॉग कैसे उपजा, शायद ये बताना बेकार है । बाकियों के मन में जो कीड़ा अक्सर कुलबुलाता रहता है वही आज मेरे मन में भी कुलबुला उठा । वो भी इतने जोर से की ऑफिस के काम से थक जाने के बावजूद इस ब्लॉग का श्रीगणेश कर रहा हूँ । माफ़ कीजियेगा पंडितजी से कोई मुहूर्त नहीं निकलवा सका ।
अब अपना परिचय भी दे दूँ । मेरा नाम अदीप कुमार है । जन्म सितम्बर की चौथी तारीख़ को १९८५ में हुआ .जिन्दगी के कुछ शुरुवाती साल फतुहा में बीते जो पटना से मोकामा की तरफ़ पटना-साहिब से थोड़ा आगे बसा एक छोटा-सा क़स्बा है । पिताजी ने पटना में मकान बनाया तो हम भी पटना वाले बन गए । १० साल की उमर में सबसे कीमती चीजें जो होती हैं एक लड़के के लिए जैसे पतंग उड़ाने की लटेई , तोता जिसे मैंने बड़ी मेहनत से कटोरे-कटोरे बोलना सिखाया था उसे लेता आया था । दोस्तों को साथ नहीं लाया जा सकता था पर माँ से इतना वादा जरूर ले लिया की जल्द ही हम सभी पुराने घर जायेंगे और मैं और दीदी अपने दोस्तों से मिलेंगे ।
खैर पटना के भी अपने ही मजे थे । हर इतवार घुमने को नयी जगह थी । जब घुमने को कुछ नहीं बचा तो फ़िर रिश्तेदारों के घर जाने की जिद होती । अब चचेरे- ममेरे भाइयों और बहनों के लिए पिताजी और माँ पटना वाले चाचा-चाची या फूफा-बुआ हो गए थे ।
वक़्त कितनी तेजी से बीतता है इसका एहसास हमें पहली बार तब हुआ जब दीदी की शादी २००३ में हमारे प्यारे जीजाजी से हो गयी । मेरे दीदी-जीजाजी की जोड़ी से हम बाद में मिलेंगे और डूब्लू से भी ।
अगले ही साल (२००४) में मैंने बी.आई.टी सिंदरी , धनबाद में नाम लिखवाया । यहाँ गलती से ही सही मैं अपने कॉलेज की पत्रिका "सर्जना"से जुड़ गया । यहाँ से मेरे जिन्दगी में कई नए आयाम जुड़े हैं । कई लोगों से मिला जिनकी एक अमिट छाप मेरे मन पर अंकित है । उनसे भी आपका परिचय करवाऊंगा और आशा है की उनमे से कई लोग यहाँ भी आयेंगे । कॉलेज की हंगामा -खेज दुनिया वो भी एक इंजीनियरिंग कॉलेज की वहां की कई यादें हैं और दोस्त भी । उनका जिक्र भी जल्दी ही होगा ।
फिलहाल IBM kolkata में कार्यरत हूँ । और इतने सादे ढंग से ब्लॉग की शुरुवात के लिए क्षमा ।
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